> > मेरी जीवन-यात्रा का आरम्भ - Meri Jiwan Yatr Ka Aarambh

मेरी जीवन-यात्रा का आरम्भ - Meri Jiwan Yatr Ka Aarambh

Posted on Saturday, 27 October 2012 | No Comments


मेरी जीवन-यात्रा का आरम्भ
प्रेषिका : माया रानी

मैं एक साधारण परिवार से हूँ, बचपन में ही मुझे मेरे मामा के घर पर उनके साथ रहने को छोड़ दिया गया था। मामा पुलिस में थे, उनकी पत्नी यानि मेरी मामी का निधन हो गया था। मेरी उम्र उस समय केवल दस साल की ही रही होगी। मामा मुझे बड़ा प्यार करते थे और सब तरह के तोहफ़े भी देते रहते थे।

समय बीतने में देर नहीं लगी। मैं वहाँ बहुत खुश थी, मामा मुझे अपने बिस्तर में ही सुलाते थे और मुझे हमेशा खूब चूमते रहते थे। मैं इसे उनका प्यार-स्नेह समझती रही।

धीरे धीरे उन्होंने रात को मेरे बदन को सहलाना और मुझे खुद से चिपटाना शुरु कर दिया, मुझे कुछ ज्यादा समझ भी नहीं आया और कुछ अच्छा भी लगता था इसलिए कभी उन्हें रोका नहीं..

मामा ने मेरे बदन के साथ ही मेरे गुप्तांगों को सहलाना शुरु कर दिया और अपना लण्ड मेरे टांगों के बीच में रगड़ने लगे, मैंने इसे भी मज़ा लेते हुए स्वीकार कर लिया। तब मैं सेक्स को भी समझ रही थी लेकिन अब तक तो उल्टा हो चुका था, मुझे मामा के बिना नींद ही नहीं आती थी। जब तक मामा अपने ऊपर या फिर साइड से अपना वो सटा कर न सुलाएँ मुझे अच्छा नहीं लगता था। धीरे धीरे मामा ने इस सम्भावना को टटोलना शुरु किया कि उनका वो मेरी चूत में घुस पायेगा या नहीं, वे रोज़ थोड़ा-थोड़ा छूते और मुझे पूरी नंगी करके अपनी उंगली से चूत को चौड़ा करने को समझाते और यह भी कि जब यह थोड़ी खुल जाएगी तो वे मुझको बहुत मज़ा देंगे। मामा मेरी चूत को उंगली से शुरु करके अपने लंड को लेने के काबिल बना चुके थे। अब मामा लगभग रोज़ ही मेरी चुदाई करते और मेरे ऊपर उपहारों की भरमार किये रहते थे, मुझे कोई एतराज़ नहीं था, मैं अपने तरीके से मज़ा ले रही थी।

फिर कुछ दिनों के बाद पापा और मम्मी को कुछ शक हुआ तो उन्होंने मुझे वापस घर बुला लिया अपने पास ही। वहाँ मेरा मन नहीं लग रहा था, मैं कुलबुलाती रहती थी, मुझे चुदने की इच्छा बनी रहती पर कुछ काम नहीं बन रहा था।

मेरा बड़े पापा का बेटा यानि मेरा चचेरा भाई मुझसे तीन साल बड़ा था, मैं उसके साथ खेल खेल में ही यह बताने की कोशिश करती रहती थी कि वो मुझे बहुत पसंद है और मैं उसके साथ पकड़ा-पकड़ी, एक दूसरे के पीछे दौड़ने जैसे खेल करती रहती थी।

एक दिन दोपहर को मैं उसे छेड़ कर उकसा कर भागी और वो मुझे पकड़ने मेरे पीछे भागा। मैं जिस कमरे में घुसी दोपहर में, उस कमरे में मेरे पापा और मम्मी कुछ दूसरा ही खेल खेलते हुए मिल गए। मम्मी खूब हंस रही थी और बिस्तर के एक कोने में कपड़ों के एक ऊँचे से ढेर पर चढ़ कर बैठी थी एकदम नंगी, उन्होंने अपने दोनों पैर चोड़े करके फैला रखे थे और अपनी चूत को अपने दोनों हाथो से खोल कर चौड़ा कर रखा था। उस कपड़ों के पहाड़ के नीचे के किनारे पर पापा वो भी पूरे नंगे अपने तनतनाते हुए लण्ड को अपने हाथ से सीधे पकड़ कर मम्मी से कह रहे थे आ जाओ सीधे नीचे फ़िसलते हुए।

मेरे पीछे मेरा भाई भी आ गया, मैंने उसे चुप रहने का इशारा किया और वो चुपचाप मेरे पीछे खड़ा होकर उसी खिड़की से पापा-मम्मी का चुदाई का तमाशा देखने लगा, साथ साथमुझे नजारे के खास अंदाज़ और अदाओं को बता कर के ध्यान देकर देखने को कह रहा था। सब चुपचाप हो रहा था, बस हमारी मौजूदगी से बेखबर पापा-मम्मी दोनों मस्त होकर हंस रहे थे और चुदाई के इस विचित्र खेल में मग्न थे। ऊपर चढ़ी बैठी मम्मी अपनी चूत खोले थी, उनकी गुलाबी चूत का नज़ारा देख मेरा भाई मस्त हो रहा था, इधर मेरी नज़र ज्यादा पापा के तनतनाते लण्ड पर टिकी थी जो माँ को नीचे आने को ललकार रहे थे कि आओ, देखूँ तुम्हारी चूत में कितना दम है। माँ की उम्र 40 और पापा 42 के थे। दोनों ही बहुत खूबसूरत और सेक्सी थे। माँ खास माल थी, उसका गदराया गोरा मदमस्त बदन किसी को भी दीवाना कर सकता था।

अब मम्मी ऊपर से लगभग चिल्लाती हुई सी नीचे को रपट कर आने लगी, पापा ने निशाना साधा और ये लो ! यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉंम पर पढ़ रहे हैं।

मम्मी की चूत सीधे पापा के लण्ड पर आकर टिकी, टिकी क्या गटक गई पूरा लण्ड, एक ही बार में पूरा चूत के अंदर था !

मम्मी पापा की जैसे गोदी में आ बैठी हों, पापा ने मम्मी की इसी अवस्था में जम कर धक्के लगते हुए चुदाई की और माँ भी उछल उछल कर गोद में ही पापा के लण्ड की सवारी करती रही। फिर पापा ने मम्मी को घोड़ी बना कर खूब चोदा। मम्मी बड़े मज़े ले रही थी और घूम घूम कर पीछे देखती थी, पापा को और अपने हाथ से लण्ड को गाइड भी करती थी।मैं देख रही थी कि भाई को भी नशा चढ़ता जा रहा था और वह मुझे वहाँ से अलग चलने को कह रहा था।

इस चुदाई को देख कर मुझे मामा की चुदाई क स्टाइल याद आ रहा था और मेरी चूत में तो खलबली सी मची हुई थी। मामा बड़े ही आराम से और मेरा ख्याल रखते हुए चोदते थे। जिस दिन उन्होंने मुझे मानसिक रूप से पहली बार की चुदाई के लिए तैयार किया उस दिन उन्होंने बहुत तैयारी की थी, मुझे समझाने से लेकर डर दूर करने और गर्भ निरोधक के अलावा चूत को पूरी तरह क्रीम से भरने तक का काम किया था। हालाँकि फिर भी मुझे उस दिन खून भी निकला और थोड़ा दर्द भी हुआ पर मज़ा भी बहुत आया,.वे हमेशा पहले मुझे बड़े प्यार से बिस्तर में ही सहला कर और चूम चाट कर खूब उत्तेजित कर लेते थे, फिर सामने से मेरी टांगों को चौड़ा करके और चूत को फैला कर धीरे धीरे ही लण्ड अंदर घुसाते थे, रोज़ नित नए चुदाई के पोज़ मुझे एक पुरानी सी किताब से दिखाते थे।

अब तक भाई कुछ ज्यादा ही बेचैन हो चुका था और मुझे खींच कर अपने कमरे में ले गया। तब तक उसका इरादा मम्मी-पापा की इस चुदाई बाबत विश्लेषण और बातें करना ही दिख रहा था।

पर कमरे पर जाकर उसने मम्मी-पापा के बारे में जिस गन्दी, या सेक्सी कहो, भाषा बोली और लण्ड-चूत, चुदाई, गांड, धक्के, रंडी, चुदक्कड़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल खुल कर करते हुए चुदाई का रंगीन नज़ारा सुनाया, उससे मैं दंग रह गई कि यह भाई तो कभी ऐसा नहीं लगा जबकि मैं तो चाहती ही यही थी कि किसी तरह यह मुझसे खुल जाये और मामा की कमी पूरी कर दे।

बस फ़िर क्या था, इतनी खुल्लम-खुल्ला बातें और हमारा मिलकर इस चुदाई के माध्यम से अपना रास्ता साफ कर लेना बहुत कम का रहा और भाई ने अपनी पूरी उत्तेजना और मेरी चूत की खुजली के मौके का फायदा उठाते हुए उसी दिन, उसी समय उसके साथ की मेरी पहली चुदाई कर डाली। मैंने पूरा सहयोग करते हुए चुदवाया तो उसको भी खूब मज़ा आया। फिर तो दोनों दे लिए ही घर में ही और बिल्कुल सुरक्षित चुदाई का इंतजाम हो गया। गर्भ से बचने की व्यवस्था बाबत मैं पहले से ही खूब सीखी-सिखाई थी।

इस प्रकार मम्मी-पापा की चुदाई के देखने से वो रास्ता साफ हो गया जिसमें हम दोनों ही झिझकते रहे थे। अब तो करीब करीब रोज़ चुदाई होती थी।

भाई ने आखिर में थोड़ी गड़बड़ कर दी, शान में आकर अपने एक दोस्त को यह सब बता दिया जो बाद में ब्लैकमेल करने लगा था और मुझे उसको भी चोदने का मौका देना पड़ा, कई कई बार मेरे चचेरे भाई के दोस्त ने मुझे चोदा।

mayaarani32@gmail.com

Leave a Reply

Powered by Blogger.