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फिर सुबह होगी - Fir Subah Hogi

Posted on Friday, 26 October 2012 | No Comments


फिर सुबह होगी
लेखिका : शमीम बानो कुरेशी

"कल सुबह सुबह तो तू मुम्बई जा रहा है ना अब्दुल?"

"हाँ बानो, बस जाने से पहले एक बार मेरी मुठ्ठ मार दे, तो मजा आ जाये !"

"भोसड़ी के, चोद ही ले ना एक बार?"

"उह्... नहीं बस मुठ्ठी मार दे एक बार जम कर, लण्ड का सारा कस बल निकल जाये !"

"तू भी भेन चोद ! एकदम चूतिया है, चिकनी चूत सामने धरी है फिर भी... खैर चल उतार अपनी जीन्स !"

अब्दुल खुश हो गया। उसने जल्दी से अपनी जीन्स उतारी और नंगा होकर मेरे सामने खड़ा हो गया। उसका झूलता हुआ लण्ड देख कर मैंने कहा,"यह तो मरदूद सोया पड़ा है, गाण्डू इसको जगा पहले, तेरे सामने बानो खड़ी है फिर भी तेरा लौड़ा ...? धत्त यार ...!"

"अरे तो चूस कर खड़ा कर दे ना?"

मैंने ज्योंही उसे छुआ, जादू का सा असर हुआ, वो सख्त होने लगा। उसे इधर उधर हिला हिल कर मैंने उसे लोहे जैसा कठोर कर दिया। फिर मैंने अपनी सलवार कुर्ती उतार दी और नंगी हो गई। मैंने उसका हाथ लेकर चूत की तरफ़ दबा दिया।

"चल भीतर अंगुली घुसेड़ दे और मुझे मस्त कर दे !" फिर मैंने उसके लण्ड को सहलाया। थोड़ा सा उस पर तेल लगाकर चिकना किया और उसके लण्ड पर ऊपर नीचे करने लगी। उसकी दो अंगुलियाँ मेरी चूत में फ़ंस चुकी थी। धीरे धीरे हम एक दूसरे पर हाथ चलाते रहे। मुझे तो बहुत मस्ती आने लगी। अब्दुल के मुख से भी सिसकारियाँ निकलने लगी। उसके लण्ड का सुपाड़े पर चमड़ी आर पार फ़िसल रही थी। उसका सुपाड़ा बार बार चमड़ी में से अपनी झलक दिखा रहा था। फिर मैंने उसकी सुपाड़े की चमड़ी को पूरी पीछे ही खींच कर उसे बाहर निकाल दिया। मेरी मुठ्ठी उसके लण्ड पर कसती गई और उसका डण्डा मसलने लगी। वो मस्ती से हाय हाय करने लगा।

"और जोर से मेरी बानो... मजा आ गया!"

"ले भोसड़ी के, मस्त हो जा ... " और मैंने उसकी गाण्ड में एक अंगुली भी डाल दी। वो मस्ती से झूम उठा।

"हाय बानो, गाण्ड मार के मुठ्ठ मरवाने में गजब का मजा है ... ले कर ना जोर जोर से !"

मेरा हाथ जोर जोर से चलने लगा। उसने मेरी चूत से अंगुली जाने कब बाहर निकाल दी। मैं तो तन्मयता से उसकी मुठ्ठ मार रही थी। तभी उसकी धार जैसी पिचकारी जोर से निकल पड़ी और साले ने मेरा चेहरा पूरा भिगा दिया। फिर भी जहाँ तक हो सका मैंने जल्दी से उसका वीर्य चाट लिया। उसका सारा कस बल निकल गया था। वो खड़ा खड़ा हांफ़ रहा था। उसने मुझे चूमा और बाय बाय कह कर चला गया। मेरी चूत साली प्यासी ही रह गई।

अब्दुल मुम्बई जा चुका था। मेरे दूसरे दोस्त जो मुझे बड़े प्यार से चोदा करते थे अनवर, युसुफ़ वगैरह तो पहले ही मुम्बई जा चुके जा थे। अब मेरा आशिक यहाँ पर अब कोई नहीं था। दिन पर दिन गुजरते गये। इन्हीं दिनों मेरी मौसी का लड़का आमिर मोहम्म्द मेरे यहाँ किसी काम से दिल्ली से आया। मेरा गेस्ट रूम, वही ऊपर का कमरा, जहा मैं अपने यारों से चुदवाया करती थी, उसे ठहरा दिया।

मेरी चूत कई दिनो से प्यासी थी, सारा शरीर कसमसाता था। रातों को मैं अंगुली किये बिना नहीं रह पाती थी बल्कि यूं कहिये कि बिना झड़े नींद ही नहीं आती थी। दिल में आग सी लग जाती थी और फिर इस आमिर ने तो जैसे आग में घी का काम किया। जवान था, कड़क चिकना था साला। लण्ड भी मस्त ही होगा। रोज मैं उसे ऊपर से नीचे तक निहारा करती थी। वो मुझे भा गया था। वो मेरे दोस्तों से जुदा था। भोला भाला सा लड़का मेरे दिल में उतरता चला गया। वो तो कई बार मेरी निगाहों को देख कर सिहर उठता था, झेंप भी जाता था। मेरी गालियों से वो डरता भी था। पर कुछ समझ नहीं पाता था। पर मैं तो उसकी बहन जो ठहरी, बहन जैसी थी ना... बस उसे यही समझ में आ रहा था।

रात को उसकी याद में मैं अपने दोनों पैरों को आपस में रगड़ लेती थी। अपनी गेंदों को दबाने लगती थी। चूत को धीरे धीरे सहलाने के बाद अंगुली डाल लेती थी। हाय राम ! अब इस साण्ड को कैसे कब्जे में करूँ?

मैंने अब उसके कमरे के चक्कर लगाने शुरु कर दिये। मैंने जबरदस्ती ही उससे बातें करनी शुरू कर दी थी। उसे जब तब मैं बनारस घुमाने ले जाया करती।

"बानो आपा, आप इतनी गालियाँ क्यूँ देती हैं?"

"ओह, बुरा मत मानो आमिर, यह तो मेरी आदत है, अब्बू से सीख लिया था। मेरी अम्मी भी तो देखा नहीं कैसी कैसी गालियाँ देती है।"

"ना ना, मेरा मतलब यह नहीं था, तुम्हारे मुख से गालियाँ सुनने पर मन में कुछ होने लगता है !"

"क्यूं भोसड़ी के, लण्ड खड़ा होने लगता है क्या?" फिर कह कर मैं खुद ही झेंप गई। अम्मा रे मेरे मुँह से यह क्या निकल गया।

"पता नहीं, कुछ दिल में गुदगुदी सी उठ जाती है ... जैसे अभी हुई थी !"

मुझे मौका सही जान पड़ा। साला मुझे ही चला रहा है, जाल डालने का सही मौका था।

"हूं...... जी, दिल में गुदगुदी तो तब ही उठती है ना जब यह मादरचोद लण्ड सर उठाने लगता है?" मैंने उसे और सेक्सी बनाने की कोशिश की।

"बानो, सच कहूँ तो सही बात है, तेरी बातों से लण्ड खड़ा होने लगता है !" उसने भी अब एक कदम आगे बढ़ाया।

मैंने अब सही वक्त जाना और उसके लण्ड पर हाथ रख दिया।

"यह तो भड़वा कड़क हो रहा है?"

"अरे छोड़ ना ... कोई देख लेगा !"

मैं हंस दी और लण्ड को थोड़ा सा और दबा कर उसे छोड़ दिया।

"साला मस्त हो रहा था तेरा लौड़ा तो?"

"बानो ... बाप रे ! तू तो क्या लड़की है ... तुझे तो शरम भी नहीं आती है... यह सब ही करना था तो घर पर कर लेती ना? यहाँ बाजार में......? तू तो मरवायेगी मुझे !"

मैंने तो उसका लण्ड पकड़ कर जैसे मैदान ही मार लिया था। अब तो बस उसे निचोड़ना ही बाकी रह गया था। मैं बाजार में पूरे समय खुश ही होती रही। मेरा दिल बाग-बाग हो रहा था। बस अब चुदना ही बाकी था, जिसका मुझे बेसब्री से इन्तजार था।

शाम को भोजन के पश्चात, वो मुझे धीरे से बोला, "ऊपर कमरे में आयेगी क्या, बातें करेंगे।"

"जा रे भड़वे, बात क्या करनी है, अपनी मुठ मार और सो जाना !"

वो हंस दिया और अपने कमरे में ऊपर चला गया। मैंने भी सोचा कि साले हरामजादे को आज तो तड़पने दो, कल खुद ही अपना लण्ड उठा कर दौड़ा चला आयेगा। मैं जाकर अपने बिस्तर पर लेट गई। पर मन मतवाला फिर भटकने लगा। लण्ड सामने है और आज नहीं ले सकती। हाय, जालिम ये लड़के इतना तड़पाते क्यूँ हैं... आकर चोद क्यों नहीं देते। मैं बिस्तर पर बल खाती रही, तड़पती रही, फिर नींद की झपकियाँ आने लगी।

तभी मेरी नींद एकदम से उड़ गई। आमिर मेरी बगल में आकर चुप से लेट गया था। मैंने थोड़ा सा खिसक कर उसे जगह ठीक से दे दी।

"भेन के लण्ड, इतनी रात को यहाँ क्यूँ आ गया?" मन ही मन मैं खुश होती हुई बोली।

"बानो तेरे बिना नींद नींद नहीं आ रही थी !" उसका कसकती आवाज में जवाब आया।

"साले हरामजादे, यूँ क्यों नहीं कह रहा है कि लण्ड फ़ड़फ़ड़ा रहा है?"

"बानो, देख दिल मत तोड़, तुझे मेरी कसम !"

उसने मुझे लिपटा लिया। मेरा दिल मोम की तरह पिघलने लगा। चूत ने नीचे अपना बड़ा सा मुख खोल दिया। शरीर फ़ड़कने लगा। उसने अपना पजामा उतार दिया। मैंने भी धीरे अपनी शमीज ऊपर कर दी। मैं उसके नीचे के नंगे जिस्म का आनन्द उठाना चाहती थी। उसने अपनी एक टांग मेरी कमर पर रख दी और धीरे से वो अपना शरीर उठा कर मेरी जांघों पर आ गया। अन्धेरे में वो मेरे ऊपर चढ गया था। अब उसका कोमल सा पेट मेरे पेट से सट गया। गर्म सा लगा।

अचानक मैं सिहर उठी। उसका करक गरम लण्ड मेरी दोनों टांगो के बीच योनि के पास गुदगुदी कर रहा था। इतना सामीप्य पाकर और गर्मी पाकर मेरी चूत से प्यार की बूंदें निकल कर बाहर आ गई और चूत को चिकना कर गई।

उसके लोहे जैसा लण्ड और उस पर नर्म चमड़ी का खोल मेरी चूत के आस पास टकराने लगा था। मेरा जिस्म गर्म हो उठा था, उसमें अदम्य वासना भरने लगी थी। मैं अपनी चूत को धीरे-धीरे यहाँ-वहाँ सरका कर लण्ड को ढूंढ रही थी। वो मेरे ऊपर अपने कसाव को बढा रहा था। अब वो मेरे गालों को और होंठो को चूमने लगा था। मैं मदहोश सी होने लगी थी। तभी उसका लोहे जैसा कड़क लण्ड जैसे मेरी योनि में प्रवेश करने लगा। मैंने भी कोशिश करके उसे पूरा समाहित करने की कोशिश की और चूत को नीचे से घुसाने के लिये ऊपर जोर लगाने लगी।

"आह ... ओह्ह्ह, आमिर ... उफ़्फ़्फ़ ... क्या कर रहे हो ...?" मैंने लण्ड को भीतर लेते हुये कहा।

उसकी सांसें जोर जोर से चल रही थी। उसके चेहरे से पसीने की दो बूंद मेरे चेहरे पर गिर पड़ी।

"मैं मर गई मेरे अल्लाह, बस करो ... उफ़्फ़्फ़ ना करो मेरे राजा..."

उसके लण्ड को भीतर घुस जाने से मुझे बहुत ही तृप्ति का अहसास हो रहा था। इतने दिनों के बाद एक नया लण्ड मिला था। नया लण्ड नया मजा... मैंने अपनी चूत को और दबा कर ऊपर उठाई और फिर वो लण्ड मेरी पूरी गहराई में समा गया। मेरे बच्चेदानी को एक सुहानी सी ठोकर लगी। उसका नरम सुपाड़ा गहराइयों में कहीं गुम हो गया था। मुझे उसके लण्ड का कड़ापन और चूत में मेरी चमड़ी का कसाव महसूस हो रहा था। मैंने अपनी दोनों बाहें उसकी कमर से कस कर लपेट ली। उसके मुख को अपने मुख से चिपका लिया।

"बस राजा, अब बस, छोड़ो ना मुझे... अह्ह्ह बस ऐसे ही लिपटे रहो, नीचे बहुत मस्ती आ रही है... अरे बस कर ना ..."

वो मुझे चूमते हुये बोला,"बानो, मेरी चिकनी बानो, जब से यहाँ आया हू, तुझे मन में बैठा कर जाने कितनी बार मुठ मारी है मैंने !"

"ओह्ह्ह्ह मेरे आमिर ... मैंने भी तुम्हारे नाम की बहुत बार मुठ मारी है ... अब चोद दो ना !"

उसने ज्योंही लण्ड बाहर खींचा, लण्ड मोटा होने के कारण मुझे रगड़ से जोर की गुदगुदी हुई।

"हाय मर गई अम्मी ... रुको तो, बहुत मजा आ रहा है।"

"पहले कभी चुदी हुई नहीं हो ना?" उसने शंका से मुझे देखा।

"नहीं राजा, मैंने कभी यह काम पहले नहीं किया है !" मैंने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुये सफ़ेद झूठ बोल दिया।

"पर लोग तो अब्दुल को तुम्हारे नाम के साथ जोड़ते हैं?"

"लोग जलते हैं रे ... वो तो मेरे बड़े पापा का लड़का है, मेरा भाई है रे !"

"मेरी ही तरह भाई है ना?" उसने कटाक्ष किया।

उसकी बात शूल की तरह मेरे दिल में चुभ गई,"चल हट रे, तू मेरा भाई कहाँ है, तू तो मौसी का लड़का है, अपने यहाँ तो मौसी के लड़के से शादी होती है ना !"

"ओह्ह मेरी बानो ... मुझे माफ़ करना ... " कह कर उसने अपना वजन मेरे ऊपर डाल दिया। पहले तो धीरे धीरे चोदता रहा फिर जाने कब उसकी स्पीड बढ़ गई। मुझे वो जन्नत में ले उड़ा। उसके नीचे दबी मैं जाने कितनी देर तक चुदती रही। जब झड़ने को हुई तो जोर जोर से ताकत से वो शॉट पर शॉट लगा रहा था। मेरी आँखें जोर से बन्द होने लगी, दांत भिंचने लगे, जबड़े कठोर हो उठे। सारा जिस्म अकड़ सा गया। और फिर मैं जोर से झड़ने लगी।

कुछ देर तक तो मैं झड़ती रही फिर मुझे चूत के अन्दर जलन सी होने लगी। अचानक उसकी पकड़ मजबूत हो गई। उसने अपना कड़ा लण्ड अन्दर जड़ तक घुसेड़ कर जोर लगाने लगा। फिर एकदम से उसका वीर्य निकल गया। उसका वीर्य मेरी चूत में समाता गया। मैं सुस्त सी निढाल पड़ गई।

उसने जल्दी से रुमाल से मेरी चूत में से वीर्य साफ़ किया।

"अब तुम घुटने बल खड़ी हो जाओ ... माल चूत में से निकलने दो।" टप टप करके चूत में से सारा वीर्य चूत से बाहर आने लगा। उसमें थोड़ा सा खून भी था।

"अरे बानू, तू तो क्या बिल्कुल वर्जिन है, यह देख खून ! तेरी झिल्ली आज फ़ट गई है, तू तो प्योर माल है, अब तू मुझे निकाह कर ले !"

मैं चकरा गई... यह कैसे हो गया। ओह्ह अन्दर जरूर कोई चोट लगी होगी। साले का लौड़ा भी मोटा था।

"आमिर, तूने तो मुझे कुँवारी से औरत बना दिया, अब मैं तेरी हो गई हूँ।" मैंने उसे और फ़ुसला लिया।

"मेरी बानो, आजकल ऐसी बिना चुदी हुई लड़की मिलती भी कहाँ हैं, सभी की सील टूटी हुई होती है।" उसने जैसे बहुत सही बात कह दी।

"तुझे क्या लगा था मादरचोद कि मैंने कई लण्ड खाये है, अरे मैंने तो ठान लिया था कि मुझे हाथ लगाने वाला मेरा खसम ही होगा !" मैंने भी इतरा कर कहा।

"अब तू इतनी बिन्दास है कि यार मन में तो यह आ ही जाता है ना, कि जाने कितनों से चुदी होगी?"

"आमिर मन तो बहुत करता था पर तेरे जैसा मुझे कोई मिला ही नहीं, और देख मुझे और चूतिया मत बना ... कल अम्मी से एक इशारा कर देना, उसके मन का बोझ भी हल्का हो जायेगा।"

"अब तेरी सील मैंने तोड़ी है तो अब ब्याह भी तो करना पड़ेगा !"

"तेरी कसम, मुझे तेरे सिवा किसी ने भी नहीं चोदा है, मेरी गाण्ड चोदेगा क्या?"

उसने मुस्करा कर जोर से हामी भर दी। खून था कि निकला ही जा रहा था। उसी हालत में मैंने उससे गाण्ड भी मरवा ली। इस बार दर्द ना होते हुये भी मैंने खूब नाटक किया। उसे मैंने अनजाने में ही चुदा चुदा कर यह विश्वास दिला दिया था कि मैंने पहली बार चुदवाया है।

वो मुझे चोद कर जा चुका था। मुझे उससे भरपूर संतुष्टि मिली थी। खुदा ने मेरी सुन ली थी, मुझे अब सच में एक सच्चा लड़का मिलने वाला था जिसने मुझ जैसी सैंकड़ों बार चुदी हुई लड़की को अक्षतयौवना मान कर स्वीकार किया था।

मैंने अपनी चूत पानी से साफ़ की। खून को धो दिया। बोरोलीन अन्दर तक लगा कर उसे चिकना कर दिया। दो दिन बाद मेरी चूत बिल्कुल ठीक थी। आमिर से मेरी शादी की बात चल निकली थी। बरसों से मेरा दिल कहता था कि मेरी भी एक दिन शादी होगी ... मैं भी खूब पति के साथ घूमूंगी, उसकी तन मन से सेवा करूँगी ... अपना दिल उस पर न्यौछावर कर दूँगी और एक पतिव्रता नारी की तरह उसकी पूजा करूंगी ... उसके चरणों में पड़ी रहूँगी ... वो सुबह कभी ना कभी तो आयेगी ही ... लो आ गई ना।

आपकी शमीम

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