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मासूम यौवना-7 - Masoom Yuvana 7

Posted on Monday, 29 October 2012 | No Comments


मासूम यौवना-7
लेखिका : कमला भट्टी

होटल से खाना खाकर हम वापिस अपने कमरे में आ गए।

मैं अपनी मैक्सी लेकर बाथरूम में चली गई बदलने के लिए, तब तक जीजाजी ने भी कपड़े उतार कर लुंगी लगा ली।

मैं भी कमरे में आई और बत्ती बुझा कर लेट गई।

मैंने कमरे में आते ही दरवाजा बंद कर दिया जबकि पिछली रात मैंने पूरा दरवाज़ा खोल रखा था अपनी असुरक्षा की भावना के कारण।

और जीजाजी ने जबरदस्ती मेरी चूत चाटी तब दरवाजा खुला हुआ ही था पर मेरा कमरा एक तरफ अलग को था कोई चल कर आये तभी आ सकता है।

जीजाजी ने जब मुझे पकड़ा तो कमरे की रोशनी तो वैसे भी बन्द थी और रात के दो-ढाई बजे थे, किसी के देखने का कोई सवाल ही नहीं था, पर जब उन्होंने मुझे चोदना शुरू किया तब उन्होंने गेट को थोड़ा ढुका दिया था। पर आज कोई ऐसी बात नहीं थी इसलिए मैंने कमरे में आते ही दरवाजा बंद कर कुण्डी लगा ली थी, जीजाजी उस बिस्तर पर एक तरफ लेटे हुए थे और एक तरफ मैं भी लेट गई।

मैंने जिंदगी में कभी सेक्स के लिए कभी पहल नहीं की थी, अगर वो चुपचाप रात भर सोये रहते तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता और मैं भी आराम से सो जाती।

मेरी सक्रिय यौन जीवन को काफ़ी साल हो चुके थे पर मैंने अपने पति से भी कभी पहल नहीं की, सेक्स मुझे कभी अच्छा ही नहीं लगा था।

हाँ जब वो छेड़ना शुरू करते तो उनकी संतुष्टि कराते कराते कभी मुझे भी मज़ा आ जाता पर मेरे लिए यह कोई जरुरी काम नहीं था।

मैं सीधी सो रही थी कि जीजाजी ने मेरी तरफ करवट ली और मुझे भी अपनी तरफ मोड़ लिया और बांहों में भर लिया।

मैं थोड़ी कसमसाई, फिर मैंने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया। मुझे पता चल गया था कि अब इनको नहीं रोक सकती, जहाँ मैं और वो तन्हाई में हैं तो मेरा विरोध कोई मायने नहीं रखता, रात के अँधेरे में जब दो जवान जिस्म पास हों तो सारे इरादे ढह जाते हैं।

अब मुझे दीदी नहीं दिख रही थी, जीजाजी नहीं दिख रहे थे दिख रहा तो मेरा प्यारा आशिक दिख रहा था जिसने मुझे जिंदगी का वो आनन्द दिया था जिससे मैं अब तक अनजान थी।

जीजाजी मेरे गले गाल और कंधे पर चुम्बनों की बौछार कर रहे थे, उन्होंने कई बार मेरे लब भी चूसने चाहे पर मैंने उनका मुँह पीछे कर दिया, मुझे ओंठ चूसना-चुसवाना अच्छा नहीं लगता था, एक तो मेरी साँस रुक जाती थी दूसरा मुझे दूसरे के मुँह की बदबू आती थी।

जीजाजी मेरे सारे बदन पर हाथ फेर रहे थे। मैंने मैक्सी खोली नहीं थी, ना ही ब्रेजियर खोला, वो ऊपर से ही मेरे छोटे छोटे नारंगी जैसे स्तन दबा रहे थे, मेरे शरीर पर बहुत कम बाल आते हैं, मेरे साथ वाली लड़कियाँ पूछती हैं कि मैंने हटवाए हैं क्या? जबकि कुदरती मेरे बाल कम आते हैं टाँगों पर तो रोयें भी नहीं हैं थोड़े से जहाँ आते हैं वो ऊपर की तरफ ! चूत तो वैसे भी मेरी चिकनी रहती है।

मेरे जीजाजी मेरे चिकने बदन की तारीफ करते जा रहे थे और हाथ फेरते जा रहे थे। उनका हाथ मेरे चिकने बदन पर फिसल रहा था, मेरी मेक्सी कमर पर आ गई थी, उनकी लुंगी भी फिसल कर हट गई थी, वे सिर्फ चड्डी पहने हुए थे।

मैं बाथरूम में ही अपनी कच्छी उतार आई थी, मुझे पता था, जीजाजी जिस तरह सारे रास्ते फाड़ खाने वाले अंदाज से घूर रहे थे, उस हिसाब से मेरी कच्छी मेरे बदन पर रहनी ही नहीं थी। मैं उसे हाथ में ही लेकर आई थी और कपड़ों में रख दिया था सुबह पहनने के लिए।

सिर्फ मेक्सी ही बची थी मेरे शरीर पर, मेरा पेटीकोट भी कब का उतार कर सिरहाने की तरफ फेंक दिया था उन्होंने।

अब वो मुझे बुरी तरह से चूम रहे थे, उनकी अंगुलियाँ मेरी सूजी हुई चूत की फांकों पर घूम रही थी। उनकी एक अंगुली ने मेरा चूत का दाना ढूंढ लिया था, उस पर वो अंगुली गोल गोल घूम रही थीम मेरे मुँह से आ.....ह आ ...ह की सिसकारियाँ निकल रही थी। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

मुझे पिछली रात का मेरी चूत चटाई का दृश्य याद आ गया था, मुझे जैसे जीजाजी के आधे उड़े हुए बालों वाला सर मेरी चूत के पास महसूस हो रहा था और ख्यालों में उनके सर को अपनी जाँघों में भींचने के लिए अपने पैर आपस में रगड़ रही थी।

मेरा मन कर रहा था कि मेरे जीजाजी मेरी चूत को चाटें, हल्का-हल्का काटें और अपनी जीभ को गोल करके जितना अन्दर घुसा सकते हों घुसा लें।

मुझे ताज़ा ताज़ा चूत चटाई को जो आनन्द पहली बार मिला था मैं वो फ़िर से पाना चाहती थी पर शर्म के मारे यह बात कह नहीं पा रही थी और शायद जीजाजी का आज चूत चाटने की कोई योजना नहीं थी इसलिए वो मुँह मेरे मुँह और वक्ष से नीचे ही नहीं ले जा रहे थे।

फिर वो ऊँचे हुए तो मैंने सोचा कि शायद चूत चाटने की बारी आई पर उन्होंने तो अपनी चड्डी अपनी एक टांग से निकाली, वो कभी अपनी चड्डी पूरी नहीं उतारते थे, एक टांग में पिंडली के पास चड्डी को रखते थे कि कभी जल्दी से चड्डी पहननी पड़े तो पहन लें, उन्होंने मेरी टांगें ऊँची की और अपने लण्ड के सुपारे पर थोड़ा थूक लगाया और मेरी चूत के मुहाने पर रख कर झटका लगाने की तैयारी करने लगे पर मुझे यह मंजूर नहीं था तो मैंने उनको हटाने के लिए हल्का सा धक्का दिया और उनका लण्ड फिसल गया।

वे चौंके, बोले- क्या कर रही हो?

मैंने कहा- अभी रुक जाओ, बाद में करेंगे !

उन्होने कहा- प्लीज !

मैंने कहा- नहीं !

वो जबरदस्ती मेरी चूत में लौड़ा घुसाने की कोशिश कर रहे थे, साथ ही गिड़गिड़ा भी रहे थे- करने दो प्लीज !मैंने कहा- अभी नहीं ! आधी रात के बाद करना, अभी मकान में कई लोग जाग रहे होंगे, उन्हें पता चल जायेगा !

वो प्लीज प्लीज करते करते मेरी चूत में अपना लण्ड डालने की कोशिश भी कर रहे थे और वो थोड़े कामयाब भी हो गए, उनका सुपारा आधा-एक इंच तक मेरी चूत में घुस भी गया था और वो आनन्द में थोड़े ढीले पड़े और मैंने उनको जोर का धक्का देकर नीचे गिरा दिया पक की आवाज के साथ उनका लण्ड मेरे चूत से निकल गया और फटाक से मैंने अपनी मैक्सी नीचे अपनी पिंडलियों तक कर ली।

जीजाजी अचानक धक्के से मेरी बगल में गिर गए। वो थोड़ी देर तो जैसे सकते में आ गए हों, कुछ बोल नहीं पाए ! शायद मुझ पर ग़ुस्सा भी हो रहे होंगे पर मुझे पता है कि मर्द का गुस्सा कितना स्थाई रहता है जब उसका लण्ड खड़ा हो।

फिर वो बोले- क्या हुआ? लण्ड निकाला क्यूँ ? मेरी हालत ख़राब है, मेरी जान निकल जाएगी अगर तुमने चुदवाया नहीं तो !

मैंने कहा- मैंने कब मना किया है, पर थोड़ा रुको तो सही ! कम से कम बारह तो बजने दो, ताकि सब सो जायें ! फिर अपने पास तो सारी रात पड़ी है।

मेरी बात सुनकर वो खुश हो गए और बोले- ठीक है ! अब तुम कहोगी, तब ही डालूँगा !

और फिर से मुझे बांहों में भर लिया और चूमने लगे।

एक मिनट में ही मेरी मैक्सी अपने पुरानी जगह यानि कमर के पास आ गई थी, उनके हाथ मेरी जांघों, पिंडलियों और मेरी छोटी सी चूत के ऊपर फिर रहे थे।

शायद उन्हें पता चल गया था कि मैं क्या चाहती हूँ। वो उठे और अपना मुँह मेरी चूत में घुसा दिया।

आनन्द के मारे मेरी आ..आ..आह. की सिसकारी निकल गई और मैंने खुदबखुद अपनी टांगें चौड़ी कर ली। अब वो बड़े मज़े से मेरी चूत चाट रहे थे, बल्कि खा रहे थे।

वो शायद अपना गुस्सा मेरी चूत पर निकाल रहे थे पर मुझे बहुत आनन्द आ रहा था।

वो कभी मेरी पूरी चूत को अपने मुँह में लेने की कोशिश कर रहे थे, साँस के साथ मेरी फांकों, चूत के दाने और साथ की चमड़ी को भी खींच के मुँह में भर रहे थे और जितनी देर रख सकते थे, रख रहे थे।

मुझे बहुत ही आनन्द आ रहा था, मेरी आँखें बंद थी और मुँह से सिसकारियों पर सिसकारियाँ छुट रही थी। कभी कभी जब उनके दांत सीधे चूत में चुभ जाते तो मैं उछल जाती और वो हाथों से मेरे हाथ दबाकर मुझे इशारा कर देते कि अब ध्यान रखूँगा !

वो अपने होंठों के पीछे दांत रख कर मेरे चूत के दाने को चिभला देते तो मेरा आनन्द बढ़ जाता।

वे अपनी जीभ को गोल कर मेरी मेरी चूत में घुसा रहे थे और मैं कह रही थी- और अन्दर डालो !

वो कहते- इससे ज्यादा जीभ नहीं जा सकती !

साथ ही अपनी चार उंगलियाँ मोड़कर बीच वाली उंगली को चूत में घुसाने की कोशिश कर रहे थे, इस कोशिश में उनका अंगुली का हिस्सा मेरे दाने को रगड़ रहा था। मेरा बदन कांप रहा था, पूरे शरीर में झुरझुरी सी हो रही थी, मैं जाड़े के बुखार की तरह कांप रही थी, मेरा पानी छुट रहा था, मेरा पानी दो-तीन मिनट तक छूटता है लगातार, और मैं सांसें भरती हूँ, उलजलूल बकती हूँ और पानी छोड़ती हूँ !

जीजाजी मेरा पानी चाट रहे थे, उनकी लार मेरी चूत पर गिर रही थी और वो लार बहकर मेरी गाण्ड से होते हुए नीचे बिस्तर को गीला कर रही थी।

जब मैं पूरी तरह से स्खलित हो गई तो मैंने उनको रोक दिया और खींच कर अपने से लिपटा लिया।मुझे बहुत आनन्द आया था इसलिए मैं उन्हें चूम रही थी, वो भी थोड़ा शांत हो गए थे।

थोड़ी देर के बाद फिर वो मुझे सहलाने लगे अब मैं शांत होकर उनका सहयोग कर रही थी, मेरा आनन्द मुझे चूत चटवा कर मिल गया था, अब मैं उन्हें मज़ा देना चाहती थी।

जीजाजी ने मुझे फिर से सहलाना शुरू कर दिया। शायद उनके हाथों में जादू है, थोड़ी देर में ही फिर से मेरी सीत्कारें निकालनी शुरू हो गई। जीजाजी को इस बात का पता चल गया था और वे फिर नीचे खिसक कर फिर से मेरी चूत चाटने लगे।

मेरे मुँह से तो आ....आ...की आवाजें आ रही थी।

फिर वे थोड़ा ऊँचे हुए और अपनी अंगुली से मेरा छेद टटोला और अपना सुपारा छेद पर भिड़ा दिया।

मैंने भी उनके लण्ड को अपनी चूत में लेने के लिए अपनी चूत को ढीला छोड़ा और थोड़ी अपनी गाण्ड को ऊँची की, मेरी दोनों टांगें तो पहले से ही ऊँची थी।

जीजाजी ने अपने दोनों हाथ मेरे चूतड़ों के नीचे ले जाकर मेरी चूत को और ऊँचा किया और एक ठाप मारी।

थूक से और मेरे पानी से गीली चूत में उनका लण्ड गप से आधा घुस गया। मुझे थोड़ा दर्द हुआ क्योंकि मेरी चूत के पपोटे पिछली चुदाई की वजह से थोड़े सूजे हुए थे। पर जब लण्ड अन्दर घुस गया तो फिर मेरा दर्द भी ख़त्म हो गया और मेरे बदन में आनन्द की हिलोरें उठने लगी।

जीजाजी ने हल्का सा लण्ड पीछे खींचा और फिर जोर से धक्का मारा, मैं सिहर उठी, उनका सुपारा मेरी बच्चेदानी से टकरा गया। उनका लण्ड झड तक मेरी चूत में घुस चुका था, उन्होंने पूरा घुसा कर राहत की साँस ली और मैंने अपनी चूत का संकुचन कर उनके लण्ड का अपनी चूत में स्वागत किया जिसे उन्होंने अपने लण्ड पर महसूस किया। जबाब में उन्होंने एक ठुमका लगाया।

मैंने साँस छोड़ कर उनको स्वीकृति का इशारा दिया और उन्होंने घस्से लगाने शुरू कर दिए। मैंने अपनी आँखों पर वहीं पड़ी अपनी चुन्नी ढक ली और आनन्द लेने लगी, मुँह ढक लेने से शर्म कम लगती है।

और चुन्नी के अन्दर से उनको कभी कभी चूम भी लेती थी। उन्होंने कस कर दस मिनट तक धक्के लगाये, फिर मेरी टांगें सीधी कर दी, अपने दोनों पैर मेरे पैरों पर रख दिए और अपने पैर के अंगूठों से मेरे पैर के पंजे पकड़ लिए और दबादब धक्के मारने लगे। दोनों पैर सीधे रखने की वजह से मेरी चूत बिल्कुल चिपक गई थी और उनका लण्ड बुरी तरह से फंस रहा था।

थोड़ी देर में ही उन्हें पता चल गया कि इस तरह तो वो जल्दी स्खलित हो जायेंगे तो उन्होंने फिर से अपने पैर मेरे पैरों से हटा कर बीच में किये और मेरे कूल्हे पर हल्की सी थपकी दी। मैं उनका मतलब समझ गई और फिर से अपनी टांगें ऊँची कर दी।

इतनी देर की चुदाई के बाद मेरा पानी निकल गया था और फिर उन्होंने अपना लण्ड फिर से बाहर निकाला और अपनी थूक से भरी जीभ मेरी चूत पर फिराई।

मैंने कहा- धत्त ! बड़े गंदे हो ! अब वहाँ मुँह मत लगाओ !

तो उन्होंने कहा- पहले लगाया तब?

मैंने कहा- अब आपका लण्ड घुस गया है, अब नहीं लगाना !

उन्होंने कहा- मैंने पहले तेरी चूत चाटी, अब अपने लण्ड का भी स्वाद ले रहा हूँ !

पर मैंने कहा- नहीं अब आप मुझे चूमना मत !

उन्होंने कहा- मुझे तो चोदना है, चूमने की जरुरत नहीं है।

मैंने कहा- ठीक है !

एक बार फिर उन्होंने अपना लण्ड मेरी चूत में फंसा दिया। सुपारा घुसा तब थोड़ा दर्द हुआ फिर सामान्य हो गया।

अचानक मुझे याद आया, मैंने पूछा- कंडोम लगाया या नहीं?

उन्होंने कहा- नहीं !

मैंने उचक कर कहा- तो फिर अपना लण्ड बाहर निकालो और कंडोम पहनो !

उन्होंने हंस कर कहा- अभी पहन लिया है, चैक कर लो !

मैंने कहा- मुझे आपकी बात का विश्वास है !

उन्होंने कहा- नहीं, चैक करो !

और चोदते हुए उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मेरी अंगुलियों से अपने लण्ड को छुआ दिया। कंडोम पहना हुआ थाम मेरी अंगुली आधे लण्ड को छू कर रही थी और अंगुली से घर्षण करते हुए उनका लण्ड मेरी चूत में दबादब जा रहा था।

उन्होंने कहा- अपने हाथ से चूत पर पहरा रखो कि यह अन्दर क्या घुस रहा है !

मैंने कहा- मेरे हाथ से तो अब यह घुसने से नहीं रुकेगा !

हालाँकि उनके कहने से मैंने हाथ थोड़ी देर अपनी चूत के पास रखा। फिर मुझे उनकी बातों से आनन्द आने लग गया और मैंने उनको कमर से पकड़ लिया।

करीब बीस मिनट से वो मुझे लगातार चोद रहे थे पूरी गति से ! उनके माथे से पसीना चू रहा था जिसे वो अपनी लुंगी से पौंछ रहे थे पर कमर लगातार चला रहे थे।मेरी चूत में जलन होने लगी थी और मैं उन्हें अपना पानी जल्दी निकाल कर मुझे छोड़ने का कह रही थी। वे भी मुझे बस दो मिनट- दो मिनट का दिलासा दे रहे थे पर उनका पानी छुटने का नाम भी नहीं ले रहा था।

मैंने उन्हें धक्के देने शुरू किये तो वो बोले- अपना पानी निकले बिना तो लण्ड बाहर निकालूँगा नहीं ! और तू ऐसे करेगी तो मुझे मज़ा नहीं आएगा और सारी रात मेरा पानी नहीं निकलेगा।

तो मैं डर गई, मैंने कहा- मैं क्या करूँ कि आपका पानी जल्दी निकल जाये?

तो वो बोले- तू नीचे से धक्के लगा और झूठमूठ की सांसें-आहें भर तो मेरा पानी निकल जायेगा।मरता क्या ना करता ! उनके कहे अनुसार करने लगी। उन्हें जोश आया और वे तूफानी रफ़्तार से मुझे चोदने लगे। अब वे भी कुछ थक गए थे और अपना पानी निकालना चाहते थे। मेरी झूठ-मूठ की आहें सच्ची हो गई और मुझे फिर से आनन्द आ गया, मैं जोर से झड़ने लगी और मैंने उन्हें जोर से झकड़ लिया।

उनका सुपारा उत्तेजना से कुत्ते की तरह फ़ूल गया था, वे बिजली की गति से धक्के लगा रहे थे, उनके मुँह से आह आह की आवाज़ें आ रही थी और मुझे चोदने के साथ वो मेरी माँ को चोदने की बात भी कर रहे थे, साथ ही कह रहे थे- साली आज तेरी चूत फाड़ कर रहूँगा ! बहुत तड़फाया है तूने साली ! बहुत मटक मटक कर चलती थी मेरे सामने ! आज तेरी चूत लाल कर दूँगा तुझे और कोई आशिक बनाने की जरुरत ही नहीं है, मैं ही बहुत हूँ !

ऐसी कई अनर्गल बातें करते हुए उन्होंने एक झटका खाया और मुँह से भैंसे की तरह आवाज निकली।

मुझे पता चल गया कि जिस पल का मैं इंतजार कर रही थी, आखिर वो आ गया। मैंने अपनी इतनी देर रोकी साँस छोड़ी। फिर भी उन्होंने धीरे धीरे आठ दस धक्के और लगाये और मेरी बगल में पसर गए और गहरी गहरी सांसें लेने लगे।

वो पसीने से तरबतर हो गए थे, करीब तीस मिनट लगातार चुदाई की थी उन्होंने ! उन पर अब उम्र भी असर दिखा रही थी !

तो उनको अपनी उखड़ी सांसें सही करने में 4-5 मिनट लगे फिर 2-3 लम्बी लम्बी सांसें लेकर वो बाथरूम की तरफ चले गए।

मुझ से तो उठा ही नहीं जा रहा था, मेरा कई बार पानी निकल गया था।

कहानी चलती रहेगी।

kamlabhati@yahoo.com

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