> चिरयौवना साली-28 - Chiryauvana Sali 28

चिरयौवना साली-28 - Chiryauvana Sali 28

Posted on Thursday, 25 October 2012 | No Comments


चिरयौवना साली-28
लेखिका : कमला भट्टी

रात को जोरदार चुदाई के बाद जीजाजी और मैं बाथरूम में जाकर फ़्रेश हो आए और फ़िर जीजाजी बिस्तर पर आ कर मेरी पीठ से चिपक कर सो गए !

चुदाई की थकान से मुझे एकदम नींद आ गई और मैं सपनों की दुनिया में पहुँच गई।

मैंने सपने में देखा कि मैं सुनहरे पंखों वाली एक परी हूँ जो किसी अनजान लोक में उड़ रही हूँ, मैं बहुत ही गोरी, नाजुक और मासूम सी परी हूँ जो आज ही इस लोक में आई हूँ। मेरी कमसिन काया अभी तक यहाँ के तेज़ हवा के थपेड़े भी नहीं सहन कर पा रही है और मेरी प्यारी आँखें हर चीज को उत्सुकता से देख रही हैं।

चारों तरफ हरे भरे घास के मैदान, आकाश को चूमती बड़े बड़े पेड़ों की डालियाँ, बस जनजीवन नज़र नहीं आ रहा था।

उड़ते उड़ते थक गई तो नीचे हरी हरी घास का मैदान ऐसे दिख रहा था जैसे कोई कालीन बिछा हुआ हो।

तो उसे देख मैं अपनी माँ की सीख भूल गई कि किसी अनजान जगह ना तो जाना चाहिए और न ही रुकना चाहिए !

जमीन पर उतरते ही वहाँ की कोमल घास ने स्वागत किया, थोड़ा दूर वे विशालकाय पेड़ अब मुझे भयानक लग रहे थे ! उस घास पर बैठते ही लेटने का मन हुआ और मुझे थोड़ी देर में नींद आ गई।

मेरी नींद कोई भारी बोझ सीने पर आ जाने के कारण टूटी, मैंने देखा कि मेरे ऊपर एक काला कलूटा भारी भरकम दानव चढ़ा हुआ है, उसकी आँखों में वासना के साथ आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी भी है कि आज उसे मेरे जैसी सुन्दर परी मिल रही है !

मुझ कोमल सी परी के लिए जिसने अभी सेक्स किया क्या कभी देखा भी नहीं, उसे एक धक्का सा लगा और चेतना-संज्ञा शून्य हो गई, तब तक उस दानव ने मेरे पर नोच दिए, उसके भारी हाथ मेरे कोमल हाथों से नहीं रुक रहे थे और मेरे पूरे शरीर को जैसे नोच रहे थे, मैं दर्द से कराह रही थी और मेरे दर्द को देख कर उस दानव के मुख से आनन्द भरी चीखें निकल रही थी। थोड़ी देर में ही मेरे परी लोक के कपड़े उसके हाथों से फट कर उतर चुके थे, अब मेरा बदन चमक रहा था जिसे देख कर वो दानव बौरा गया था और उसने भी अपने कपड़े फटाफट फाड़ डाले। अब वो मेरे टांगों के बीच आ गया, मैं अपने नाजुक हाथों से उसे दूर करने की भरसक कोशिश कर रही थी और उसके पत्थर जैसे सीने पर मुक्के बरसा रही थी जो उसे फ़ूल की तरह लग रहे थे और उसकी उत्तेजना में वृद्धि ही कर रहे थे। उसने मेरे पैर जबरदस्ती फ़ैला दिए उसका लिंगमुंड मेरी अक्षत योनि के मुख पर आ गया। उसने उसे मेरी चूत के छेद पर टिका कर एक धक्का मारा तो उसका लण्ड सारे किलों को मटियामेट करता अन्दर घुस गया। मेरे मुँह से आह की आवाज़ निकली और तभी मेरा सपना टूटा।

मैंने आँखे खोली- कहाँ परी ! कहाँ दानव !

मैं और जीजाजी होटल के कमरे में एक पलंग पर नंगे हैं, जीजाजी ने अपना लण्ड मेरी चूत में फंसा रखा है, मेरे टांगें अपनी भारी टांगों के नीचे दबा रखी है और दनादन चोद रहे हैं !

मुझे अपने सपने पर हंसी आई पर मैंने जीजाजी को कहा- मुझे जगाया क्यों नहीं जब चोदना था तो?

वे बोले- तुमने ही तो कहा था कि जब इच्छा हो अपना लण्ड फंसा लेना और मैंने फंसा लिया पर तुम नींद में मुझे रोक रही थी और मुझे धक्के भी दे रही थी और हल्की-हल्की रो भी रही थी। और जब तुमने मुझे नींद में रोका तो मुझे भी तुम्हें जबरदस्ती चोदने का मज़ा आ रहा था।

अब मैं उन्हें क्या कहती कि मैं सपना देख रही थी और उन्हें कह देती कि सपने में आप दानव हो !

मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा और उनके सीने से चिपक गई, उनके धक्कों का आनन्द लेने लगी। अब मेरी चूत सपने के आनन्द के कारण ज्यादा ही चिकनी हो गई थी और जीजाजी का लंड सटासट जा रहा था।

मैं जल्दी ही स्खलित हो गई और फिर जीजाजी भी ढह गए। उन्होंने कंडोम पहले से लगाया हुआ था। उन्होंने कहा- मेरी नींद खुली तो मैं ज्यादा उत्तेजित था इसलिए मैंने कंडोम लगा कर ही चुदाई शुरू की थी।

वे भी कोई दस मिनट में झर गए थे पर मुझे भी आनन्द दे गए ! मैं पेशाब करके चूत धोकर आई तब रात के ढाई बज रहे थे। और फिर जीजाजी भी पेशाब करके आये और मुझसे चिपक कर लेट गए। उनका मुरझाया और पानी से धुला हुआ लण्ड कुछ गीला सा मेरे कूल्हों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था ! >

फिर सुबह हमने कमरा छोड़ा, मैं अपनी ड्यूटी और जीजाजी अपने गाँव चले गए।

बस ! यही है मेरी कहानी !

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