> मासूम यौवना-14 - Masoom Yuvana 14

मासूम यौवना-14 - Masoom Yuvana 14

Posted on Thursday, 25 October 2012 | No Comments


मासूम यौवना-14
लेखिका : कमला भट्टी

थोड़ी देर में वे बाहर आये, अब वे शांत लग रहे थे, उन्होंने कहा- अब फ्रेश होकर कपड़े पहन लो, खाना खाने चलते हैं।

कमरे में तो यह पता ही नहीं चल रहा था की दिन है या रात पर घड़ी 7 बजा रही थी और मैं फटाफट नहाने चल दी। नहाने के बाद मैंने पूरी राजस्थानी ड्रेस पहनी घाघरा, लुगड़ी आदि और जीजाजी के साथ लिफ्ट से नीचे खाना खाने चल दी।

जीजाजी ने खाना खाते हुए मुझे कहा- जितनी भूख हो उससे खाना कम खाना, सेक्स में आनन्द आएगा।

यह ज्ञान भी मेरे लिए नया था कि पेट थोड़ा कम भरना चाहिए जब चुदना या चोदना हो !

मैंने कहा- मुझे चुदाई के बाद भूख लगी तो?

जीजाजी ने हंस कर कहा- तुम चिंता मत करो, मेरे बैग में मिठाई, नमकीन, काजू की कतली आदि है। जब हम सोयेंगे और भूख होगी तो खा लेंगे !

मैंने कहा- ठीक है।

और फिर हम खाना खा रहे थे तो वहाँ बैठे लोग हमें ज्यादा देख रहे थे, मेरी पोशाक की वजह से मैं पूरी गाँव वाली लग रही थी पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वे कौन सा मुझे जानते थे और जीजाजी की नज़र तो मेरे ऊपर से हट ही नहीं रही थी, मुझे पता था कि उनका पानी नहीं निकला था और वो अन्दर उबल रहा होगा !

मैं मन ही मन उनकी हालत पर मुस्कुरा रही थी।

वे मुझे खाना परोस रहे थे, मैंने उन्हें कहा- लड़की होने के फायदे हैं ! देखो हमारी चूत के पीछे आप कितनी चमचागिरी कर रहे हो और पैसे खर्च कर रहे हो ! मैं जो कहती हूँ वो करते हो, लड़कों को इतना करना पड़ता है। अच्छा हुआ मैं लड़का नहीं बनी, मुझसे तो इतना नहीं होता ! देखो मज़ा दोनों को आता है प़र पसीने पसीने आदमी ज्यादा होता है, लड़की को कभी कुछ खर्च नहीं करना पड़ता और लड़के उन्हें साथ ही गिफ्ट भी देते है।

जीजाजी मेरी बातें सुनकर मुस्कुरा रहे थे, बोले- जो तुम इतनी कीमती चीज हमें देती हो, उस पर ये सब कुर्बान है। तुम्हें क्या पता तुम हमें कितनी कीमती चीज देती हो ! अपनी इज्जत ! समझी? अभी किसी को पता चल जाये तो लड़कों को फर्क नहीं पड़ता और लड़की बदनाम हो जाती है। समझी इन पैसों का तो क्या, और कमा लेंगे प़र इज्जत?

मैं चुप हो गई, वास्तव में जीजाजी सही कह रहे थे।

खाना खाकर फिर से हम वापिस रेस्टोरेंट के पास ही लिफ्ट से सीधे तीसरी मंजिल में अपने कमरे के कॉरीडोर में पहुँच गए ! नीचे रेस्टोरेंट था उसके ऊपर रिसेप्शन और कुछ कमरे थे उसके ऊपर हमारा कमरा और भी काफी कमरे थे और उससे भी ऊपर दो मंजिलें और थी यानि उस होटल में काफी कमरे थे ! हमारा कमरा काफी अच्छा था, जीजाजी ने बताया जो सबसे अच्छा और महंगा था, वही हमने लिया है।

हम अपने कमरे में दाखिल हो गए और सीधे बिस्तर पर ढेर हो गए !

मैं टीवी का रिमोट लेकर मनपसंद चैनल स्टार प्लस लगा कर देखने लगी! जीजाजी ने फोन लगा लिया और किसी से बात करने लगे !

अभी हमने अपने कपड़े नहीं बदले थे, जीजाजी ने कहा- अभी बदलना ही मत ! अभी चाय मंगवाएँगे, पियेंगे !

मैंने कहा- ठीकहै।

उन्होंने वहीं इंटरकाम से दो चाय का आर्डर दे दिया और वे बाथरूम में चले गए।

थोड़ी देर में घण्टी बजी, मैंने कहा- अन्दर आ जाओ !

मुझे पता था कि चाय लेकर बैरा आया होगा। बैरा ही था !

उसने मुझे गौर से देखा मुझे उसकी नज़र कुछ अच्छी नहीं लगी। उसने मुझे पलंग पर बैठी हुई को चाय देनी चाही पर मैंने उसे डांट कर कहा- वहीं मेज पर रख दे !

मेरे तेवर देख कर वो सकपका गया और चाय वही मेज पर रख कर मुझसे नज़र चुराता फटाफट बाहर चला गया, दरवाज़ा बंद कर दिया !

जीजाजी आये तो मैंने यह बात बताई तो वो हंसने लगे और कहा- यार तुम्हें बहुत गुस्सा आता है? एकदम झाँसी की रानी हो तुम !

मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई, हमने चाय पी, थोड़ी देर में घण्टी बजी, मुझे पता था बैरा चाय के बर्तन लेने आया होगा।

यह दूसरा बैरा आया था पहले वाला नहीं आया ! बर्तन ले जाने के बाद जीजाजी ने दरवाज़ा बन्द कर दिया, मेरे पास आकर बैठ गए और टीवी देखते देखते मुझे सहलाने लगे।

मैंने भी अपना सर उनके कंधे पर रख दिया !

मैंने कहा- अब तो मैं ये भारी भरकम कपड़े उतार दूँ?

जीजाजी ने मुस्करा कर कहा- हाँ ! बिल्कुल हल्की हो जाओ ! सारे उतार दो !

मैं उनका अभिप्राय समझ कर मुस्करा उठी, मैंने कहा- आप दूसरी तरफ मुँह करो, मैं कपड़े बदलती हूँ !

तो उन्होंने मुँह फेर लिया और बोले- ब्रेजरी और कच्छी मत पहनना !

मैंने कहा- ओके !

और मैं सिर्फ मैक्सी पहन कर सारे कपड़े वार्डरोब में रखे और उनके पास आई।

तब तक उन्होंने भी कपड़े खोल कर लुंगी लगा ली ! मैं पलंग के पास आई, कहा- बाथरूम में जा रही हूँ !

तो वे बोले- इस मैक्सी का बोझ क्यों रखा है? इसे भी उतार दो और सिर्फ यह तौलिया लपेट लो !

मैंने इंकार किया पर मेरा इंकार कहा चलना था, वो जबरदस्ती मैक्सी हटाने लगे तो मैंने कहा- ठीक है। मैं बाथरूम से सिर्फ तौलिया लपेट कर ही आऊँगी !

तो उन्होंने मुझे छोड़ दिया। मैं बाथरूम में गई, पेशाब किया, चूत को अच्छी तरह से धोया और मैक्सी उतार कर जैसे राम तेरी गंगा मेली में मन्दाकिनी ने लपेटा था, वैसे सिर्फ़ तौलिया लपेट कर बाहर आई !

मैं तौलिया लपेट कर मस्तानी चाल से पलंग के पास गई तो देखा कि जीजाजी ने कम्बल ओढा हुआ है और उनकी लुंगी एक तरफ पड़ी है, चड्डी और बनियान भी कमरे के फर्श पर लावारिसों की तरह पड़े हैं।

मैं यह सोच कर रोमांचित हो गई कि कम्बल के अन्दर जीजाजी बिलकुल नंगे हैं और मैं नई नवेली दुल्हन की तरह कुछ शरमाती, कुछ सकुचाती उस तौलिये में अपने पूरे बदन को ढकने की असफल कोशिश करती उनके पास आई ! अब मैं उस तौलिये को साड़ी तो नहीं बना सकती ना ! स्तन ढकूँ तो जांघें दिखे और जांघों को ढकूँ तो स्तन उघड़ रहे थे और मुझे चलते हुए आते भी शर्म आ रही थी !

उनके पास आते ही उन्होंने लपक कर मेरा तौलिया छीन के फर्श पर अपनी बनियान-चड्डी पर फेंक दिया और बोले- आज तुम्हारी और अपनी दोनों की शर्म दूर कर दूँगा। अब इस कमरे में ना तुम कपड़े पहनोगी और ना मैं !

मैं भी नंगी होते ही फटाफट उनके कम्बल में घुस गई ताकि अपना नंगापन ढक सकूँ ! मेरे अन्दर जाते ही वे मुझसे चिपक गए, उनका नंगा शरीर मेरे नंगे बदन से चिपक रहा था, मुझे झुरझुरी सी आ रही थी, उनका शरीर वासना की आग में जल रहा था !

जीजाजी का बदन मेरे बदन से चिपका बड़ा भला लग रहा था ! उनका नंगा सीना मेरे स्तनों से रगड़ खा रहा था ! वे मुझे बुरी तरह चूम रहे थे और मैं उनकी बाँहों में मछली की तरह फिसल रही थी, उनके नंगे बदन से रगड़ खा रही थी, उनका लिंग मेरे पेट कमर और जांघों से टकरा रहा था।

मैं भी उनके गालों-कन्धों पर चूम रही थी और उत्तेजना से काट भी रही थी। वे भी उसके जबाब में मेरे गाल-कंधे और वक्ष पर काट रहे थे और हंस कर कह रहे थे- आज मैं तुझे काटने को मना नहीं करूँगा, बस खून मत निकाल देना, बाकी ये निशान तो कल तक हट जायेंगे !

और जोश में मैंने उनके गाल पर अपने दांतों के निशान बना दिए कि वे सिसिया कर रह गए और जबाब में मेरे भी गाल काट कर मुझे सिसिया दिया !

अब वे चूमते चूमते नीचे सरक रहे थे, गालों से स्तन चूसे, फिर पेट की नाभि में जीभ फिराई और मेरी चूत में आग सी जल गई, मुझे पता चल गया कि जीजाजी खतरनाक सेक्स एक्सपर्ट हैं।

मेरे पति को तो मालूम ही नहीं था कि औरत के किन किन अंगों को चूमने पर मज़ा आता है।

जीजाजी पेट से जांघें, पिण्डली चूमते-चूमते सीधे मेरे पैरों के पंजों के पास चले गए और उन्होंने मेरे पैर के पंजे का अंगूठा अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगे।

मैं उन्हें रोकती, तब तक मेरे शरीर में आनन्द की तरंगें उठने लगी, आज मुझे पता चला कि पैर के अंगूठे या अंगुलियों को चूसने से भी स्त्री कामातुर हो सकती है।

मैं सोचती रह गई कि जीजाजी ने यह ज्ञान कहाँ से लिया होगा !

मेरे मुँह से आनन्दभरी किलकारियाँ निकल रही थी पर अपने पैरों गन्दा समझ कर मैंने उनको वहाँ से हटाना चाहा और कहा- छीः ! कोई पैरों को भी चाटता है क्या?

वे बोले- तू मेरी जान है और तेरे अंग अंग में मुझे स्वर्ग नज़र आता है। तू कहे तो मैं तेरी गाण्ड भी चाट सकता हूँ !

मैंने शरमा कर कहा- धत्त !

फिर वे पैरों को छोड़ कर मेरे मनपसंद स्थान पर आ गए, यानि कि मेरी....चूत !

कहानी तो चलती ही रहेगी ! थक जाएँ तो बता देना !

kamlabhati@yahoo.com

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